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फरवरी 1989 हिंदुस्तान गवर्नमेंट एवं यूसीसी में हुआ था समझौता

विश्व की भीषणतम त्रासदी भोपाल गैस कांड के 34 वर्ष पूरे होने के बाद भी इसकी जहरीली गैस से प्रभावित अब भी उचित इलाज,पर्याप्त मुआवजे, न्याय एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं गैस पीड़ितों के हितों के लिये पिछले तीन दशकों से अधिक समय से कार्य करने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार ने कहा, ‘‘हादसे के 34 वर्ष बाद भी न तो मध्यप्रदेश गवर्नमेंट ने  ना ही केन्द्र गवर्नमेंट ने इसके नतीजों  प्रभावों का कोई समग्र आकलन करने की प्रयास की है, ना ही उसके लिए कोई उपचारात्मक कदम उठाए हैं ’

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उन्होंने कहा, ‘‘14-15 फरवरी 1989 को केन्द्र गवर्नमेंट  अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूसीसी) के बीच हुआ समझौता पूरी तरह से धोखा था  उसके तहत मिली रकम का हरेक गैस प्रभावित को पाँचवें हिस्से से भी कम मिल पाया है नतीजतन, गैस प्रभावितों को सेहत सुविधाओं, राहत  पुनर्वास, मुआवज़ा, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति  न्याय इन सभी के लिए लगातार लड़ाई लड़नी पड़ी है ’

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जब्बार ने बताया,‘‘साल 2018 में भी गैस प्रभावितों के सबसे जरूरी मुद्दों पर बहुत कम प्रगति होना गम्भीर चिन्ता का विषय रहा है ’ उन्होंने बोला कि फरवरी 1989 में हिंदुस्तानगवर्नमेंट एवं यूसीसी में समझौता हुआ था, जिसके तहत यूसीसी ने भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर (715 करोड़ रुपए) दिये थे

जब्बार ने बोला कि हमने उसी वक्त इस समझौते पर यह कह कर सवाल उठाया था कि इस समझौते के तहत मृतकों एवं घायलों की संख्या बहुत कम दिखाई गई है, जबकि वास्तविकता में यह बहुत अधिक है. इस पर 3 अक्टूबर 1991 को उच्चतम कोर्ट ने बोला था कि यदि यह संख्या बढ़ती है तो हिंदुस्तान गवर्नमेंट मुआवजा देगी उन्होंने बताया कि इस समझौते में गैस रिसने से 3,000 लोगों की मौत एवं 1.02 लाख प्रभावित बताये गये थे, जबकि असलियत में 15,274 मृतक एवं 5.74 लाख प्रभावित लोग थे, जो इस बात से साबित होता है कि भोपाल में दावा अदालतों द्वारा साल 1990 से 2005 तक त्रासदी के इन 15,274 मृतकों के परिजनों  5.74 लाख प्रभावितों को 715 करोड़ रुपए मुआवजे के तौर पर दिये गए

उन्होंने बताया कि इस समझौते में दिये गये मृतकों एवं घायलों की संख्या सच में करीब पांच गुना अधिक होने पर सुप्रीम न्यायालय के समक्ष 2010 में अलग-अलग क्यूरेटिव याचिकाएं दायर की गयी थी, जिसमें समझौते की शर्तों पर सवाल उठाए गए थे  यह बोला गया कि समझौता मृतकों  पीड़ितों की बहुत कम आंकी गई संख्या पर आधारित थायाचिकाओं में मुआवजे में 7,728 करोड़ रुपए की अलावा बढ़ोतरी की मांग की गई है, जबकि 1989 की समझौता राशि मात्र 705 करोड़ रुपए की थी याचिका स्वीकृत हो गई है पर सुनवाई प्रारम्भ नहीं हुई है

जब्बार ने दावा किया कि 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने से रिसी जहरीली गैस मिक (मिथाइल आइसोसाइनाइट) से अब तक 20,000 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं  लगभग 5.74 लाख लोग प्रभावित हुए हैं उन्होंने बोला कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) उस समय यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) के नियंत्रण में था जो अमरीका की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी है,  बाद में डाव केमिकल कम्पनी (यूएसए) के गुलाम रहा. अगस्त 2017 से डाव केमिकल कम्पनी (यूएसए) का ई आई डुपोंट डी नीमोर एंड कंपनी के साथ विलय हो जाने के बाद यह अब डाव-डुपोंट के गुलाम है

उन्होंने बोला कि गैस त्रासदी की जहरीली गैस से प्रभावित लोग अब भी कैंसर, ट्यूमर, सांस  फेफड़ों की समस्या जैसी बीमारियों से ग्रसित हैं उन्होंने कहा, प्रभावितों के पास पैसा नहीं होने के कारण उन्हें उचित उपचार भी नहीं मिल पा रहा है

इसी बीच, गैस पीड़ितों के हितों के लिये लंबे समय से कार्य करने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संध की रशीदा बी, भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरूष प्रयत्न मोर्चा के नवाब खां, भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन के रचना ढींगरा एवं चिल्ड्रन अगेन्स्ट डाव कार्बाइड के नौशीन खान ने यहां एक संयुक्त बयान जारी कर आरोप लगाया कि केन्द्र एवं राज्य गवर्नमेंट गैस-पीड़ितों की उपेक्षा कर रही है

अपने संयुक्त बयान में उन्होंने बोला कि हाल के वैज्ञानिक अध्ययन यह बताते हैं कि यूनियन कार्बाइड के गैसों की वजह से भोपाल में मौतों  बीमारियों का सिलसिला जारी है, पर आज तक भोपाल गैस पीड़ितों के उपचार की निगरानी के लिए उच्चतम कोर्ट द्वारा गठित समिति की 80 फीसदी से अधिक अनुशंसाओं को अमल में नहीं लाया गया है

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