Wednesday , November 14 2018
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दिल्ली के अस्पताल में फेफड़ों का लगाया गया मॉडल

दीवाली के शुभ मौका पर हमारे राष्ट्र में रोशनी, मिठाईयां, सुख-समृद्धि  सौभाग्य की बात करने की परंपरा है लेकिन विडंबना ये है कि आज के दौर में दीवाली के मायने पूरी तरह बदल गये हैं अब दीवाली पर समृद्धि की नहीं  बल्कि सेहत की बात की जाती है क्योंकि शहरों की हवा में फैला प्रदूषण लोगों को बहुत बीमार कर रहा है एक-दूसरे को बधाई देते हुए लोग आजकल ये ज़रूर पूछते हैं कि आपके शहर में प्रदूषण का क्या हाल है लोगों को अपने दोस्तों  रिश्तेदारों के सेहत की चिंता है क्योंकि खुशियां मनाने के लिए अच्छे सेहत का होना बहुत ज़रूरी है 

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माना जाता है कि त्रेता युग में ईश्वर राम के अयोध्या लौटने पर लोगों ने दीये जलाकर दीवाली का त्योहार मनाया था लेकिन कलियुग में अगर ईश्वर राम को लौटना होता तो उन्हें हिंदुस्तान के तमाम शहरों के प्रदूषण की वजह से मजबूरी में Mask पहनना पड़ता ये आज की कड़वी सच्चाई है जिसने दीवाली जैसे खुशी  उत्साह से भरे त्यौहार का स्वरूप बदल दिया है आगे बढ़ने से पहले हम आपको एक वीडियो दिखाना चाहते हैं  इस वीडियो में आपको अपने भविष्य की झलक दिखाई देगी 

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अगर प्रदूषण को रोकने के अच्छा तरीका नहीं किये गये तो लोग दीवाली पर शुभ- फायदा लिखने के बजाए सेहत फायदा लिखना प्रारम्भ कर देंगे, वैसे इस वर्ष लोग दीवाली के उपहारों में मिठाइयों की स्थान Air Purifier दे रहे हैं आज दिल्ली का Air Quality Index 449 था नोएडा में आज का AQI 465, गुरुग्राम का 507, गाज़ियाबाद का 445  फरीदाबाद का AQI 320 रिकॉर्ड किया गया  अगर आप बिना मॉस्क के दिल्ली  NCR की हवा में सांस ले रहे हैं तो आज आपने 30 से ज़्यादा सिगरेट का सेवन कर लिया है  अगर ऐसा लंबे समय तक चलता रहा तो कुछ समय बाद आपके फेफड़े बहुत कमज़ोर हो जाएंगे 

इसे सरल भाषा में समझाने के लिए दिल्ली के एक अस्पताल में फेफड़ों का एक मॉडल लगाया गया है  ये बिल्कुल इंसानों के फेफड़ों की तरह कार्य करता है  तीन दिन पहले जब इस मॉडल को लगाया गया था तो इसका रंग बिल्कुल सफेद था लेकिन पिछले 72 घंटों के अंदर इसका रंग मटमैला हो चुका है  आने वाले कुछ दिनों में ये काले रंग का हो जाएगा  इस मॉडल  हमारे फेफड़ों की स्थिति लगभग एक जैसी है  हमारे फेफड़े ऑक्सिजन के नाम पर काला ज़हर सोख रहे हैं  अब आप सोचिए कि ऐसी गंभीर स्थिति में शुभ दिवाली जैसे शब्दों का क्या अर्थ रह जाता है 

प्रदूषण को दूर करने के नाम पर हमारा सिस्टम सिर्फ़ खानापूर्ति करने में लगा हुआ है  ऐसा नहीं है कि प्रदूषण के स्तर को कम नहीं किया जा सकता हमारे पास ऐसे कई राष्ट्रों के उदाहरण हैं जिन्होंने अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के ज़रिए प्रदूषण को हटाने का ही नहीं बल्कि उसे हराने का कार्य किया है  हमारा सिस्टम चाहे तो इन राष्ट्रों से एजुकेशन ले सकता है

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