Wednesday , November 14 2018
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आखिर क्यों जाने पाकिस्तान में चलेंगी नई चीनी करेंसी

भारत समेत दुनिया भर में ऐसे बहुत से सामान बिकते हैं. जिन पर मेड इन चाइना लिखा होता है. लोग इन्हें इसलिए खरीदते हैं. क्योंकि ये सस्ते होते हैं. मगर जब बात गारंटी की आती है तो खुद दुकानदार भी हाथ खड़े कर देता है. जानते हैं क्यों, क्योंकि ये भरोसेमंद नहीं होते. लेकिन पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री ने तो अपना पूरा का पूरा देश ही चाइना को सौंप दिया है. अब यहां सड़कें पुल, इमारतें, बंदरगाह, बिजली सब मेड इन चाइना होंगी. और तो और अब तो पाकिस्तान में चीन की करेंसी तक चलने वाली है. यानी पाकिस्तान में अब सामान भी चीनी करेंसी में खरीदे-बेचे जाएंगे.

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ख़जाना खाली है. रुपया गिर चुका है. इन नोटों को कोई पूछ नहीं रहा. लिहाज़ा अब पाकिस्तान में चलेंगी नई चीनी करेंसी. आज से करीब चार सौ साल पहले ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार के नाम पर भारत में दाखिल हुई थी. देश उसका गुलाम बन गया था. तब पाकिस्तान तो नहीं था. मगर अब है और अब वही गलती जो करीब 400 साल पहली की गई थी. वो पाकिस्तान कर रहा है. सीपेक के नाम पर पाकिस्तान ने ना सिर्फ अपने देश बल्कि ज़मीर और खुद्दारी सब कुछ चीन के हवाले कर दी है. आलम ये है कि चीन अब अपनी करेंसी तक पाकिस्तान में चलाने जा रहा है.

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दरअसल, पाकिस्तान में सीपेक के ज़रिए घुसपैठ करने के बाद उसे अपना गुलाम बनाने के लिए चीन ने एक और पासा फेंका है. चीन ने पाकिस्तान में ना सिर्फ 5 लाख चीनी नागरिकों को बसाने का प्लान बनाया है, बल्कि चीन यहां अपनी करेंसी भी चलाने जा रहा है. यानी पाकिस्तानी रुपये और डॉलर के बाद अब चीनी युआन भी पाकिस्तान में लीगल टेंडर बन जाएगा.

चीन के शिनजियांग से ग्वादर तक जाने वाले चाइना पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरीडोर यानी सीपेक के नाम पर अब चीन पाकिस्तान में घुस गया है. पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर से लेकर ग्वादर पोर्ट तक चीनी दबदबे का आलम ये है कि इन इलाकों में चीनी भाषा का प्रयोग भी शुरू हो गया है.

पीओके के अलावा चीनी सरकार व्यापार के लिहाज़ से पाकिस्तान के सबसे खास ग्वादर पोर्ट पर भी अपना दबदबा बढ़ा रहा है. यहां तो उसने अपने 5 लाख चीनी नागरिकों को बसाने के लिए एक अलग शहर ही बसाने का फैसला किया है. जहां सिर्फ चीनी नागरिक रहेंगे. चीनी ज़बान बोली जाएगी. और चीनी करेंसी भी चलेगी. मतलब एक लिहाज़ से पाकिस्तान ने चीनी करेंसी को लीगल टेंडर मानने की हामी भर दी है.

हालांकि ये पहल नवाज़ सरकार के कार्यकाल में ही शुरू कर दी गई थी. जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्लानिंग एंड डेवलप्मेंट मिनिस्टर अहसन इकबाल और चीनी एंबेसडर याओ जिंग ने फैसला किया था कि निकट भविष्य में पाकिस्तान में चीनी युआन को भी वही दर्जा हासिल होगा, जो अमेरिका डॉलर को है. यानी चीन और पाकिस्तान के बीच होने वाले व्यापार अब यूएस डॉलर की जगह चीनी करेंसी युआन में भी हो सकता है.

जब से अमेरिका ने पाकिस्तान को आर्थिक मदद देना बंद किया है तब से ही पाकिस्तान छटपटा रहा है. उसकी अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है. लिहाज़ा उसे चीन में ही अपना मददगार नज़र आ रहा है. मगर मदद के चक्कर में पाकिस्तान चीन की चाल को समझ नहीं पा रहा है. ऐसा करके वो चीन की करेंसी को तो अमेरिकी करेंसी के बराबर का दर्जा देकर उसे खुश कर रहा है. मगर अमेरिका को नाराज़ भी कर रहा है. यानी पाकिस्तान धीरे धीरे चीन को छोड़कर अपने सारे दरवाज़े बंद कर रहा है. और किसी पर इतना ज़्यादा निर्भर होना गुलामी की सबसे बड़ी अलामत है.

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