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यमुना नदी में घुल रहा इस शहर का जहर

होली से पहले हाथरस के रंग यमुना के लिए मुसीबत बन रहे हैं. करबन नदी के माध्यम से केमिकल युक्त पानी यमुना में आकर मिल रहा है.
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जोकि जलीय जीव-जंतुओं के लिए हानिकारक साबित हो सकता है. करबन नदी के पुल पर दूषित पानी की वजह से झाग के पहाड़ से बन रहे हैं.

गौतमबुद्ध नगर से आगरा के बीच बहने वाली करबन नदी में सादाबाद के सौरई गांव के बाहर अलीगढ़  हाथरस का ड्रेन आकर मिलता है. सादाबाद तक इस नदी की हालत कुछ अच्छा रहती है.

मगर, हाथरस का दूषित ड्रेन इस नदी के पानी में जहर घोलने का कार्य कर रहा है. हाथरस में रंगों का बड़ा कार्यहोता है. होली से पहले यहां यह कारोबार जोर पकड़ जाता है. रंगों का केमिकल युक्त पानी ड्रेन के माध्यम से करबन में आकर मिलता है.

बाद में यही करबन नदी झरना नाला स्थित दरगाह के पास आकर यमुना में मिलती है. ऐसे में इस नदी का सारा दूषित पानी यमुना को प्रदूषित कर देता है. दरअसल, अलीगढ़  हाथरस का पूरा सीवर करबन में आता है.

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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की मानें तो इन दोनों जिलों के पास गंदे पानी की निकासी का  कोई दूसरा रास्ता नहीं है.अलीगढ़ में कई स्लॉटर हाउस भी हैं. इनकी गंदगी भी इसी ड्रेन में आती है.

करबन नदी कितनी दूषित हो चुकी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां झाग इतना बन जाता है कि वह दूर से किसी ग्लेशियर जैसा दिखता है.

जलेसर रोड स्थित करबन नदी पुल (झरना नाला) के दूसरी तरफ जब गंदा पानी थोड़ी ऊंचाई से गिरता है तो यहां झाग के पहाड़ दिखाई देते हैं.

लोगों की मानें तो यह झाग कभी-कभी पुल के ऊपर तक आ जाते हैं. झाग फैक्ट्रियों से आ रहे केमिकल से बनता है.आलम यह है कि यहां नाक पर रुमाल रखे बिना खड़ा होना कठिन है. दुर्गंध से पास के गांव के लोग परेशान हैं.

करबन नदी झरना नाला स्थित हाजी इदरिश की दरगाह के पास यमुना में मिलती है. इस बीच इसके पानी का कहीं शोधन नहीं होता. यमुना पहले से ही दूषित है.

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रुनकता से ताजगंज के बीच तमाम फैक्ट्रियों का केमिकल युक्त पानी सीधे यमुना में गिरता है. शहर से निकलने वाला 550 एमएलडी से अधिक पानी भी बिना शोधन डाला जा रहा है.

करबन का दूषित पानी पीकर साल 2014 में बड़ी संख्या में नील गायों ने दम तोड़ दिया था. तब यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अलर्ट जारी करते हुए पशुओं को इस नदी का पानी न पिलाने के विषय में अलर्ट जारी किया था.

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